Saturday, March 24, 2012

एक कहानी -दिल की जुबानी

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कभी कभी हम कुछ ऐसा देख लेते है जो हमें अन्दर तक कचोट देता है! ऐसा ही कुछ नन्ही सेसे  सीमू के साथ हुआ! सीमू मेरी पहली स्टुडेंट, जब मैंने अपना जब खर्च निकलने क लिए घर पैर पढ़ाना शुरू किया था! बहुत मासूम सी  सीमू अपने मुह बोले भाई हीरा से बहुत प्यार करती थी! मुझे आज भी याद है कभी कभी उसकी वजह से  अपनी माँ से मार भी खा लिया करती! गलती हीरा की होती और पिटती बेचारी सीमू!
हीरा सीमू से कुछ चार पांच साल बड़ा होगा !! पढने मैं वो सीमू से अच्छा था! परन्तु उसे जूठ बोलने और रुपये चुराने की आदत थी! क्यूंकि उसके शौक बहुत बड़े बड़े थे ! बस फिर छोटी सी वो बच्ची अपने भाई के कहने पैर कुछ बी करने को तैयार रहती एक दिन ऐसे ही खेलते खेलते वो मेरे पास आई और बोली आज भैया मुझे घुमाने ले जा रहे है पैर उन्हों ने मुझे किसी से बताने को मन किया है अपने दोस्तों को भी ले जा रहे है हम सब उनके स्कूल के पीछे वाले ग्राउंड मैं खलेगे मैंने उसे पहले इतना खुश कभी नहीं देखा था मैं मन ही मन सोचने लगी आखिर कब तक यह मासूम यूँ ही अपने इन दूर के रिश्तेदारों क रहमो करम पैर जी सकेगी छोटी छोटी बात पैर हसने वाली सीमू न जाने कब तक अपने इस भाई हीरा के कारन पिटती रहेगी उस शाम  काफीबर्रिश हो रहीथी कितनी दिएर तक मैं हीरा और सीमू की राह देखती रही  वो पढने आ जाये पैर उस दिन वो नहीं आये मैंने सोचा  शायद खेल कर थक गए होगये और बर्रिश भी तो है चलो   कल आजायेंगे लेकिन वो अगले दिन बी नहीं आये ऐसा दो तीन दिन हुआ तो मुझे भी चिंता होने लगी फिर मैं उनके घर पूछने गई तो पता चला की सीमू तो बीमार है अस्पताल मैं है मुझे उसे देखने का बहुत मान था और चिंता बी की आखिर ऐसा क्या हुआ क वो इतना बीमार हो गई अस्पताल जाने पैर देखा क उसके पास हीरा की माँ है जब मैंने सीमू से बात करने की कोशिश की तो हीरा की माँ ने बीच मैं ही टोक दिया कहा मैडम जी बच्ची की तबियत ठीक नहीं सोने दीजिये घर आएगी तो बात करियेगा मैं कुछ परेशान हो गई और वह से उठ आई पैर सर्री रात कुछ मान मैं चुभता रहा न जाने क्यूँ लगा की उस बाची के साथ कुछ तो है जो गलत हुआ है मैं फिर रोज़ इस आस मैं अस्पताल जाने लगी की शायद कभी उस से बात हो जाये पैर वो मौका मुझे नहीं मिला तो दो दिन बाद मैंने वह की एक नर्स से सीमू के बारे मे पूछ ही लिया उस नर्स ने जो बताया उसे सुन कर एक बार तो जैसे मेरी रूह काप गयी उस दिन खेल के बहाने उसके भाई और दोस्तों ने उस बच्ची बेचारी को ही आपना खेल बना लिया था इस बात को छुपाने और  के दर से ही हीरा के माँ बाप उस बची पैर इतना पैसा लगा रहे थे शहर मैं अच रुतबा होने के कारन उस बेचारी की आवाज़ उनके घर से बहार नहीं जा पाई लेकिन आज तक बी मैं उस लड़की को दोबारा अपने आस पास नहीं देखा जब की हीरा आज बी ख़ुशी से अपना जीवन जी रहा है दुःख है मुझे तो सिर्फ इस बात का की यह सब देख के भी मैंने उस समय उसके लिए कुछ नहीं किया अगर करती तो शायद दोषी यूँ हस्त मुस्कुराता न गुमता और वो मासूम हँसी आज भी मुझे आस पास सुन जाती 

हादसा

जिंदगी कभी कभी एक हादसा लगती है,
क्या कहें  न जाने क्यूँ  हर वक़्त कुछ कमी   लगती है
भूलते है हम हर जाने वाले को
फिर भी न जाने क्यूँ,
कुछ कमी सी हर वक़्त  खलती है
अरमान दिल मैं बहुत है मगर
न जाने क्यूँ फिर भी मंजिल धुंदली सी लगती है
हाथ  मिलाते  है अजनबी जब
एक सिहरन सी बदन मैं उठती है
हर हाथ  कातिल लगता है
हर मुस्कान झूटी लगती है
जब से तुम दूर हुए हो हर ख़ुशी बेमानी  लगती है,
लोग बहुत है पास मेरे
पर तेरी  कमी खलती है
झूठ कहू या सच कहू ,
तेरे दूर होने की बात से,
 आज भी दिल मैं एक टीस सी उठती है!   


Tuesday, March 20, 2012

Aapne liye jina to aab sikha hai,
Auro k liye jikar bahut dekh liya,
Aacha hai mujhe matlabi keh lo yaaron,
Varna fir na kehna k maine yeh bhi mauka na diya.........

Monday, February 20, 2012

Sapne


Na jaane kin sapno ki talaash main hai hun,
manzil mil jati hai fir bhi bhagte rahte hai hum.
bahut kuch piche reh jata hai,
... aur agye baadh jate hai hum.
kaisi ajeeb hai yeh sapno ki duniya,
haar duri ko mita deti hai,
jo na mil pai haqiqat main,
use ek pal mai mila deti hai........

Sunday, January 29, 2012

तमनाएं

कुछ तम्मनाये अधूरी रहे तो अच्छा है
zindagi yunhi सफ़र में रहे तो अच्छा है
भूल जाते है हम खुदा को आपनी तमनाओ में
उसकी रज़ा में ही सब हो यही अच्छा है
मैंने भी कभी तुझे भूलने की कोशिश की
तभी शायद आंसुओं के समंदर ने मेरी ज़िन्दगी में शिरकत i
आज खुली फिजा में भी घुटन लगती है
न जाने क्यूँ अपने देश की हवा ही बेमानी लगती है
यह पता था मुझे की तुम रास्ता बदल जोग्ये
फिर भी न जाने क्यूँ तेरी वो हस्सी मुझे आज भी आपनी सी लगती है

Saturday, April 9, 2011

soch Kaise kaise

Kabhi kabhi har din kitna bozil sa lagta hai. Koi samachar padh kar lagta hai ki kyun roz vahin kahaniya dohrai jati hai? kyun roz hi ek hi natak ko naya naya labada odha kar pash karna padta hai. isi baat ko soch soch kar to sab se man pasandida kaam akhbaar padhna bhi ubau lagne lagta hai. Per fir bhi hain to insaan hi na jo nahi karna usi per dyaan rahta hai aur roz hum fir subha uthe hi akhbaar padhna shuru kar dete hai.
Itna he nahi dil aur dimaag ko nhi to ek i jagha rakhne ki kitni joothi koshish karte rahte hai hum, lekin vo fir se ulti dishao main hi bhtakte rahte hai. Agar dil kahega yeh karna hai to dimaag ulta chalega. Aur hum aur aap bus khud ko in dono ki kashmkash main piste hue dekhne k ilava kuch kar hi nahi pate. Per chalo aacha hi hai kisi kaam main to lage rahte hai dil aur dimaag nahi to inke pass hume tang karne k ilawa kaam hi kya rakha hai chalo theek hi hai isi bhane hum bhi thoda sa kuch naya karne ki koshish kar lete hai, nahi to agar rozana zindagi ki tarha hum khud se hi Ubne lage to .......?

Ajnaabi

Ajnaabi raho main nikle the,
teri tamanna kar mere humkadam,
tum door nikal gaye gairo ki tarha,
hum to bus dekhte rahe tere nishaan-a-kadam.

Bhatke kuch is tarha dagar se,
apna naam-o-nishan bhi na mila,
teri aarju main aise tute k judne ka aasar bhi na raha.